क्या ब्याज दरों में कटौती से शेयर बाजार को मिलेगा बूस्ट?
नई दिल्ली | वॉशिंगटन फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में संभावित कटौती को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फेड चेयरमैन जेरोम पावेल के बीच मतभेद ने ग्लोबल मार्केट में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। ट्रंप का मानना है कि यह सही समय है ब्याज दरों में कटौती का, जबकि फेड इस समय इसे जोखिम भरा मान रहा है।
इस बहस के बीच सबसे बड़ा सवाल है—क्या वाकई ब्याज दरों में कटौती से शेयर बाजार को बूस्ट मिलेगा? आइए इस सवाल को अर्थव्यवस्था के अलग-अलग पहलुओं से समझते हैं।
1. ब्याज दरों का बाजार पर सीधा असर
ब्याज दरें कम होने का मतलब है—लोन सस्ते होंगे, कर्ज लेना आसान होगा, और कंपनियों को विकास के लिए पूंजी सुलभ होगी। इससे निवेश बढ़ता है और कॉर्पोरेट मुनाफे में इजाफा होता है, जिससे शेयर बाजार को सपोर्ट मिलता है।
लेकिन यह तभी फायदेमंद होता है जब बाजार में विश्वास बना रहे। अगर ब्याज दरें गिरें लेकिन साथ में अनिश्चितता बनी रहे (जैसे कि टैरिफ वॉर या ग्लोबल स्लोडाउन), तो बाजार में उल्टा दबाव भी बन सकता है।
2. निवेशकों की मानसिकता रिस्क बनाम रिटर्न
कम ब्याज दरों का एक दूसरा असर यह होता है कि फिक्स्ड इनकम इन्वेस्टमेंट्स जैसे बॉन्ड्स और सेविंग्स पर रिटर्न घट जाते हैं। ऐसे में निवेशक शेयर मार्केट की ओर रुख करते हैं। इससे बाजार में लिक्विडिटी बढ़ती है और इंडेक्स ऊपर चढ़ सकते हैं।
हालांकि, यह लाभ तभी होता है जब अर्थव्यवस्था में स्थिरता हो और व्यापारिक नीतियां स्पष्ट हों।
3. फेड का दृष्टिकोण संतुलन बनाना ज़रूरी
फेड चेयरमैन जेरोम पावेल का कहना है कि फिलहाल टैरिफ बढ़ने, महंगाई में संभावित उछाल और बेरोजगारी की आशंका जैसे मुद्दे मौजूद हैं। ऐसे में ब्याज दरों में कटौती से लघुकालिक राहत तो मिल सकती है, लेकिन इससे लंबी अवधि की अस्थिरता और बढ़ सकती है।
4. ऐतिहासिक उदाहरण क्या कहते हैं?
-
2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान जब फेड ने ब्याज दरों को शून्य तक ला दिया था, तब शुरुआत में बाजार अस्थिर रहा लेकिन धीरे-धीरे रिकवरी आई।
-
वहीं, 2020 के कोविड संकट में ब्याज दरों में कटौती और स्टिमुलस पैकेज का मिला-जुला असर दिखा और शेयर बाजार ने तेजी से उछाल मारा।
5. भारतीय बाजार पर इसका क्या असर हो सकता है?
अगर अमेरिकी फेड ब्याज दरें घटाता है, तो भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भी फॉलो कर सकता है। इससे भारतीय बाजार में भी तेजी देखने को मिल सकती है—विशेष रूप से बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट सेक्टर में।
हालांकि, रुपये की वैल्यू, क्रूड ऑयल के दाम, और विदेशी निवेशकों का रुख (FII activity) भी इस पर निर्भर करेगा।